कुल्लू दशहरे में नहीं होता पुतलों का दहन लेकिन सांकेतिक रूप में गोबर से बनाए जाते हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के मुखौटे अंतिम दिन झाड़ियों में आग लगाकर सांकेतिक रूप से लंका दहन के साथ होता है दशहरे का समापन

📍 स्थान / Location: Kullu 🗂️ विषय / Category: हिमाचल / Himachal 📹 Full Video / पूरा वीडियो 📅 October 26, 2026 🌐 GPS: Kullu

कुल्लू दशहरे में नहीं होता पुतलों का दहन
लेकिन सांकेतिक रूप में गोबर से बनाए जाते हैं रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के मुखौटे
अंतिम दिन झाड़ियों में आग लगाकर सांकेतिक रूप से लंका दहन के साथ होता है दशहरे का समापन

भारत में इन दिनों जहां नवरात्रि का त्यौहार मनाया जा रहा है। तो वही कई जगहों पर कलाकारों के द्वारा रामलीला का भी मंचन किया जा रहा है। ऐसे में रामायण से जुड़े हुए विभिन्न दृश्यों को भी कलाकारों के द्वारा दर्शाया जा रहा है और विजयदशमी के दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले को आग लगाकर इसका समापन किया जाता है। विजयदशमी के दिन बड़े-बड़े रावण के पुतले जलाए जाते हैं और देश भर में दशहरा उत्सव का समापन किया जाता है। लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में विजयदशमी के दिन ही दशहरे की शुरुआत होती है। इस दशहरा उत्सव की खास बात यह है कि यहां पर ना तो रावण के पुतला जलाया जाता है और ना ही यहां किसी तरह की आतिशबाजी होती है। यहां पर राज परिवार के द्वारा लंका दहन के दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के मुखौटे को जलाया जाता है और उसके साथ ही साथ दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का भी समापन किया जाता है।

जिला कुल्लू के मुख्यालय ढालपुर में 21 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव की शुरुआत हो गई है और 7 दिनों के बाद इसका समापन किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के पहले दिन भगवान रघुनाथ की विशाल रथ यात्रा निकाली गई। जिसमें जिला कुल्लू के विभिन्न इलाकों से आए सैकड़ो देवी देवता शामिल हुए। 7 दिनों तक भगवान रघुनाथ अपने अस्थाई शिविर में विराजमान रहेंगे और सातवें दिन लंका दहन की प्रक्रिया को पूरा करने के बाद वापस अपने मंदिर लौट जाएंगे। ऐसे में यहां पर विभिन्न देवी देवताओं के साथ भगवान श्री राम लंका पर चढ़ाई करेंगे और लंका बेकर नामक स्थान पर देव विधि के साथ इन सभी मुखौटे को जलाया जाएगा और उसके बाद भगवान रघुनाथ वापस अपने देवालय की ओर लौट जाएंगे। ऐसे में नवरात्रि के अवसर पर भगवान रघुनाथ के पुजारी के द्वारा मिट्टी और गोबर से बने कुछ मुखोटे तैयार किए जाते हैं। जिन्हें रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के साथ-साथ अन्य रावण की सेना का प्रतीक माना जाता है।

दशहरा उत्सव के दौरान लंका दहन के लिए मिट्टी और गोबर से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटे बनाए जाते हैं। यह परंपरा कई वर्षों से निभाई जा रही है, और इस कार्य को भगवान रघुनाथ के पुजारी दिनेश किशोर के निर्देशन में संपन्न किया जाता है। मुखौटे बनाने की प्रक्रिया दशहरा उत्सव से पहले ही नवरात्रों में शुरू हो जाती है। पुजारी के द्वारा सबसे पहले, मिट्टी और गोबर को मिलाकर मुखौटों का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद इन मुखौटों को कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता है ताकि ये पूरी तरह से कठोर हो जाएं।
मुखौटे सूखने के बाद, उन पर विभिन्न प्रकार के चेहरे और आकृतियां उकेरी जाती हैं। इन मुखौटों को विशेष रूप से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के रूप में चित्रित किया जाता है। पेंटिंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इन्हें लंका बेकर नामक स्थान पर लंका दहन के लिए तैयार किया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी देखी जाती है।

दशहरे की इस महत्वपूर्ण रस्म के लिए भगवान रघुनाथ अंतिम दिन अपने अस्थायी शिविर से निकलते हैं और रथ में विराजमान होकर ढालपुर मैदान से लंका बेकर की ओर प्रस्थान करते हैं यह स्थान ढालपुर मैदान के पास स्थित कैटल ग्राउंड के समीप है जहां लंका दहन की परंपरा का निर्वाह किया जाता है। भगवान रघुनाथ का रथ जब यहां पहुंचता है, तो एक खास विधि विधान के तहत झाड़ियों और गोबर-मिट्टी से बने रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटों को जलाया जाता है। इसे लंका दहन के रूप में देखा जाता है, जो रावण पर भगवान राम की विजय का प्रतीक है।

भगवान रघुनाथ के पुजारी दिनेश किशोर ने बताया कि कुल्लू दशहरे का लंका दहन सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि यह पर्व लोगों में उत्साह और उल्लास का प्रतीक है.ल। इस आयोजन में भाग लेने वाले हजारों लोग भगवान रघुनाथ के विजय रथ की झलक पाने के लिए आतुर रहते हैं। मुखौटे जलाने की यह प्राचीन परंपरा कुल्लू की संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। जो धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामूहिक उल्लास का भी संगम प्रस्तुत करती है।

बाइट – दिनेश किशोर

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