गणेश उत्सव के लिए मोगा में सज रही हैं भगवान गणेश की मनमोहक प्रतिमाएं

📍 स्थान / Location: मोगा 🗂️ विषय / Category: पंजाब / Punjab 📹 Full Video / पूरा वीडियो 📅 September 3, 2026

14 सितंबर को देशभर में गणेश उत्सव का पर्व श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। गणेश उत्सव को लेकर मोगा में भगवान गणेश क

गणेश उत्सव के लिए मोगा में सज रही हैं भगवान गणेश की मनमोहक प्रतिमाएं

छह महीने पहले शुरू हो जाता है प्रतिमाएं बनाने का काम, दिन-रात मेहनत के बावजूद आमदनी मजदूरी तक सीमित; राजस्थान से आए कारीगर परिवार सहित तैयार कर रहे 1000 से 1200 प्रतिमाएं

मोगा, 3 सितंबर (दलीप कुमार) 14 सितंबर को देशभर में गणेश उत्सव का पर्व श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाएगा। गणेश उत्सव को लेकर मोगा में भगवान गणेश की विभिन्न आकारों और आकर्षक डिजाइनों वाली प्रतिमाएं तैयार करने का काम जोरों पर है। राजस्थान से आए कारीगर अपने परिवारों के साथ दिन-रात मेहनत कर गणेश जी के अलावा भगवान विश्वकर्मा तथा लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटे हुए हैं। रंग-बिरंगी और आकर्षक प्रतिमाएं लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।मूर्ति बनाने वाले कारीगर ने बताया कि प्रतिमाएं तैयार करने का काम करीब छह महीने पहले ही शुरू कर दिया जाता है। सबसे पहले अलग-अलग डिजाइन के अनुसार प्रतिमाओं के फ्रेम तैयार किए जाते हैं। किसी प्रतिमा को बैठी मुद्रा में बनाया जाता है, जबकि कुछ प्रतिमाएं अलग-अलग आकार और डिजाइन के अनुसार तैयार की जाती हैं। फ्रेम तैयार करने में करीब एक से दो महीने का समय लग जाता है। इसके बाद फ्रेम पर मिट्टी चढ़ाने का काम शुरू होता है।

कारीगर के अनुसार प्रतिमाएं तैयार करने के लिए मुल्तानी मिट्टी, चाक मिट्टी और गोला मिट्टी सहित विभिन्न प्रकार की मिट्टी को मिलाकर घोल तैयार किया जाता है। इसके बाद चिकनी मिट्टी की कई परतें फ्रेम पर चढ़ाई जाती हैं। प्रतिमा सूखने के बाद उसे सुखाने की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। बाद उसकी रिपेयरिंग की जाती है और फिर रंग-रोगन तथा सजावट का काम शुरू होता है।

उन्होंने बताया कि प्रतिमाओं को आकर्षक बनाने के लिए पानी में घुलने वाले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। बड़ी प्रतिमाओं को मजबूती देने के लिए अंदर लकड़ी, घास-पत्ती और अन्य सामग्री का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद गोल्डन रंग, स्टोन और अन्य सजावटी सामग्री लगाकर प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जाता है।

कारीगर ने बताया कि इस काम में पूरा परिवार सहयोग करता है। परिवार के बच्चे और अन्य सदस्य भी अपनी क्षमता के अनुसार काम में हाथ बंटाते हैं। बरसात के मौसम में प्रतिमाएं तैयार करना और उन्हें सुरक्षित रखना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। बारिश से बचाने के लिए प्रतिमाओं को तिरपाल से ढककर रखना पड़ता है।

उन्होंने बताया कि प्रतिमाएं बनाने का अधिकांश काम हाथ से किया जाता है, जबकि रंग-रोगन और फिनिशिंग का कुछ हिस्सा मशीनों की मदद से किया जाता है। मशीन से फिनिशिंग करने के बाद प्रतिमा अधिक साफ-सुथरी और आकर्षक दिखाई देती है। एक सीजन में करीब 1000 से 1200 प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, जिन्हें आसपास के गांवों और क्षेत्रों में बेचा जाता है। कई दुकानदार भी कारीगरों से प्रतिमाएं खरीदकर आगे बेचते हैं। ग्राहकों की मांग के अनुसार एक फुट से लेकर पांच फुट तक की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं।

कारीगर ने बताया कि पांच से छह हजार रुपये में बिकने वाली एक प्रतिमा को तैयार करने में करीब तीन से चार हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। ऐसे में बचने वाली राशि बहुत अधिक नहीं होती। यदि रंग-रोगन या सजावट के दौरान प्रतिमा का कोई हिस्सा खराब हो जाए तो उसे दोबारा रिपेयर कर बिक्री योग्य बनाया जाता है, जिससे सामग्री भी बेकार नहीं जाती।

उन्होंने कहा कि इस काम में दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन मेहनत के मुकाबले कमाई काफी सीमित है। उन्हें मुख्य रूप से मजदूरी के हिसाब से करीब 500 से 600 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। इसी आमदनी से परिवार का रोजमर्रा का खर्च और खाने-पीने की जरूरतें पूरी होती हैं।

गणेश उत्सव के बाद विश्वकर्मा और लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं का काम

कारीगर ने बताया कि गणेश उत्सव के बाद विश्वकर्मा पूजा के लिए प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। इसके बाद दीपावली के लिए लक्ष्मी-गणेश की एक से दो फुट तक की प्रतिमाएं बनाने का काम शुरू हो जाता है। इस तरह वर्षभर अलग-अलग त्योहारों के अवसर पर उनका काम चलता रहता है।

उन्होंने कहा कि प्रतिमाएं तैयार करने में काफी मेहनत लगती है, लेकिन यह पारंपरिक काम ही उनके परिवार की रोजी-रोटी का मुख्य साधन है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं और बारिश सहित तमाम परेशानियों के बावजूद प्रतिमाओं को समय पर तैयार करने का प्रयास करते हैं।

श्रद्धा और भावना ही सच्ची भक्ति का आधार : विक्रम

भगवान गणेश की प्रतिमा लेने पहुंचे विक्रम सिंगला ने बताया कि वह पिछले पांच-छह वर्षों से गणेश उत्सव श्रद्धा और भावना के साथ मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि गणेश जी की प्रतिमा का रंग या बाहरी सजावट सबसे महत्वपूर्ण नहीं है। भगवान के प्रति मन में मौजूद श्रद्धा, निष्ठा और भावना का वास्तविक महत्व है।

उन्होंने बताया कि प्रतिमाएं तैयार करने में मिट्टी और पीओपी के मिश्रण का इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि शुद्ध मिट्टी आसानी से उपलब्ध हो तो वह शुद्ध मिट्टी से बनी प्रतिमा को ही प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।

विक्रम ने कहा कि कई बार ग्राहक बड़ी प्रतिमाओं पर स्टोन और अन्य सजावटी सामग्री लगाने की मांग करते हैं। हालांकि भगवान की प्रतिमा को सजाने से अधिक जरूरी है कि उसकी पूजा पूरी श्रद्धा और साफ मन से की जाए। उन्होंने लोगों से दिखावे की बजाय भक्ति और अच्छी भावना को प्राथमिकता देने की अपील की।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति ईमानदार रहना चाहिए। भगवान के प्रति पूरी श्रद्धा से किया गया समर्पण ही भक्ति का वास्तविक रूप है। भक्ति में वस्तु से अधिक भावना का महत्व होता है।

पांच से सात दिन घर में स्थापित करते हैं गणपति

गणेश उत्सव के दौरान होने वाली पूजा के बारे में विक्रम ने बताया कि वे पांच से सात दिनों तक गणपति जी को घर में स्थापित करते हैं। इस दौरान फूलों की माला, इत्र आदि अर्पित किए जाते हैं और लड्डू, केले सहित अपनी श्रद्धा के अनुसार विभिन्न प्रकार का भोग लगाया जाता है।

उन्होंने कहा कि भगवान को अर्पित की जाने वाली वस्तु की कीमत या मात्रा से अधिक भक्त की भावना महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति पूरी श्रद्धा, प्रेम और निष्ठा के साथ गणेश जी को कुछ समर्पित करता है तो यही उसकी सच्ची भक्ति है।

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