सदियों पुरानी परंपरा का साक्षी बना कुल्लू, शेष नाग जी की तीन भाद्र यात्रा में दिखी देव संस्कृति की झलक
कुल्लू: जिला कुल्लू उपमंडल बंजार की फलाचन घाटी के आराध्य देवता श्री शेष नाग जी की तीन भाद्र से जुड़ी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा इस वर्ष भी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई गई। परंपरा के अनुसार हर तीन वर्ष बाद तीन भाद्र को देवता शेष नाग जी अपने मूल देवस्थान बीचुल टॉप जाते हैं और वहां धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से देव शक्ति अर्जित करने के बाद अपने देहरे की ओर लौटते हैं।
इसी परंपरा के तहत देवता शेष नाग जी ने बीचुल टॉप में विधिवत पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान के बाद ठेहर पहुंचकर अपने देवलुओं और श्रद्धालुओं को दर्शन दिए। देवता के आगमन पर पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह का माहौल रहा। ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार घी से भरे पात्रों से देवता का स्वागत और अभिनंदन किया।
समुद्र तल से करीब चार हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित बीचुल टॉप को देवता का प्राचीन और पवित्र स्थान माना जाता है। यहां देव कारदारों और पुजारियों ने पारंपरिक विधि-विधान से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करवाए। इसके बाद देवता के साथ देवलु और अन्य श्रद्धालु देहरे की ओर रवाना हुए।
मान्यता है कि हर तीन वर्ष बाद होने वाली यह यात्रा देव शक्ति अर्जित करने और क्षेत्र के कल्याण के लिए की जाती है। देवता के साथ कारदार, देवलु, वाद्ययंत्र और श्रद्धालु पारंपरिक यात्रा में शामिल होते हैं। इस दौरान स्थानीय देव संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।
गजरमाल अर्पित करने की भी है परंपरा
देहरे में पहुंचने के बाद देवता शेष नाग जी को गजरमाल अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार गजरमाल श्रद्धा, भक्ति, सेवा और समर्पण का प्रतीक है। इसे देवता के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना जाता है।
देवता शेषनाग जी के गुर भागसिंह, कारदार चंदे राम, पुजारी कुमतराम, मेहता गौतम राम, मुन्शी हेत राम, मोती राम, डोला राम, राम कृष्ण, पूर्ण चन्द आदि इस यात्रा के दौरान विशेष रूप से मौजूद रहे।
स्थानीय लोगों का मानना है कि देवता शेष नाग जी के आशीर्वाद से क्षेत्र में सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और जनमानस की रक्षा होती है। देवता की कृपा से क्षेत्र में शांति और खुशहाली बनी रहती है। लोगों का कहना है कि तीन भाद्र की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि फलाचन घाटी की समृद्ध देव संस्कृति और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी प्राचीन परंपराएं क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान हैं और इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रखना सभी का दायित्व है।